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    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Mar 2025

    सलाम करने की!

    ग़रज़ मुझे न दर-ए-ताजदार तक ले जाए,सलाम करने की हाजत पड़े ख़ुदा न करे| जिगर बरेलवी

  • 5th Mar 2025

    ज़िंदगी के मुर्दों में!

    कहाँ से जान पड़े ज़िंदगी के मुर्दों में,अदा-ए-हुस्न क़यामत अगर बपा न करे| जिगर बरेलवी

  • 5th Mar 2025

    कोई दुआ न करे!

    किसी का मुझ पे कुछ एहसान हो ख़ुदा न करे,दवा तो क्या मिरे हक़ में कोई दुआ न करे| जिगर बरेलवी

  • 5th Mar 2025

    प्रेम, भय और अतीत!

    मैक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘मां’ में एक वृद्ध महिला जो विद्रोह का नेतृत्व करती है और उसे ‘मां’ कहा गया है, वह बोलती है – ‘जो हमारी आज हालत है, इससे बुरा क्या हो सकता है!’ इसलिए डर किस बात का है, खुलकर सामने आओ और अत्याचारी शासन के विरुद्ध विद्रोह करो! जब तक शासन…

  • 4th Mar 2025

    वो मर्द है जो कभी!

    वो मर्द है जो कभी शिकवा-ए-जफ़ा न करे,लबों पे दम हो मगर नाला-ओ-बुका न करे| जिगर बरेलवी

  • 4th Mar 2025

    लोगों ने साथ निभाया!

    इतने दिन एहसान किया दीवानों पर,जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है| साहिर लुधियानवी

  • 4th Mar 2025

    दिल ही काम आया है!

    अव्वल अव्वल जिस दिल ने बर्बाद किया,आख़िर आख़िर वो दिल ही काम आया है| साहिर लुधियानवी

  • 4th Mar 2025

    पैदाइश के दिन से!

    पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं,इस मक़्तल में कौन हमें ले आया है| साहिर लुधियानवी

  • 4th Mar 2025

    इंसाँ का ख़ूँ बहाया है!

    झूट तो क़ातिल ठहरा इस का क्या रोना,सच ने भी इंसाँ का ख़ूँ बहाया है| साहिर लुधियानवी

  • 4th Mar 2025

    ख़ुशियों का लोभ!

    हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो,हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है| साहिर लुधियानवी

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