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चिड़िया की उड़ान!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्य कवि एवं मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। चक्रधर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – चिड़िया तू जो मगन, धरा मगन, गगन मगन,फैला ले पंख ज़रा,…
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गर ज़बाँ मिट जाएगी!
‘मंज़र’ अपने ख़ून से इस शाख़ को सरसब्ज़ कर,गर ज़बाँ मिट जाएगी तेरा हुनर देखेगा कौन| मंज़र भोपाली
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एक दिन मज़लूम!
एक दिन मज़लूम बन जाएँगे ज़ुल्मों का जवाब,अपनी बर्बादी का मातम उम्र भर देखेगा कौन| मंज़र भोपाली
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बिजलियाँ भर पाँव में!
बिजलियाँ भर पाँव में आगे ज़माने से निकल,बन गया जो तू ग़ुबार-ए-रह-गुज़र देखेगा कौन| मंज़र भोपाली
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आप ही मुंसिफ़ भी हैं!
आप ही की है अदालत आप ही मुंसिफ़ भी हैं,ये तो कहिए आप के ऐब-ओ-हुनर देखेगा कौन| मंज़र भोपाली
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याद के सूखे गुलाबों!
याद के सूखे गुलाबों से सजा है दिल का बाग़,ज़ख़्म ये गुज़रे दिनों के अब मगर देखेगा कौन| मंज़र भोपाली
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चाँद के आगे भला!
तुम हो महफ़िल में तो मेरी चश्म-ए-तर देखेगा कौन,चाँद के आगे भला दाग़-ए-जिगर देखेगा कौन| मंज़र भोपाली
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वहाँ क्या भैंस बंधेंगी!
आज कवि सम्मेलनों से संबंधित एक- दो प्रसंग याद आ रहे हैं। शुरू में जब दिल्ली में रहता था तब कवि गोष्ठियों में तो जाना होता ही था, वहीं प्रसिद्ध मंचीय कवियों से शोभित आयोजन भी देखने-सुनने का अवसर मिलता था। जैसे लाल किले का कवि सम्मेलन, जिसके कर्ता-धर्ता उस समय गोपाल प्रसाद व्यास होते…