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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Apr 2026

    फिर रस्ते को रस्ते भर!

    जब ‘शारिक़’ पहचान गए मंज़िल की हक़ीक़त,फिर रस्ते को रस्ते भर उलझाया हम ने| शारिक़ कैफ़ी

  • 4th Apr 2026

    दुनिया के कच्चे रंगों!

    दुनिया के कच्चे रंगों का रोना रोया,फिर दुनिया पर अपना रंग जमाया हम ने| शारिक़ कैफ़ी

  • 4th Apr 2026

    इन लम्हों में किसकी!

    इन लम्हों में किसकी शिरकत कैसी शिरकत,उसे बुला कर अपना काम बढ़ाया हम ने| शारिक़ कैफ़ी

  • 4th Apr 2026

    तन्हाई को जगह जगह!

    घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे,तन्हाई को जगह जगह बिखराया हम ने| शारिक़ कैफ़ी

  • 4th Apr 2026

    तेज़ चलने लगी गुर्बत में हवा!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज अपने स्वर में एक खूबसूरत नज़्म की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मैंने बहुत पहले डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब के एक उपन्यास में पढी थीं आउर मुझे अभी तक याद हैं- तेज़ चलने लगी गुर्बत में हवा, गर्द जमने लगी आईने पर! आशा है आपको…

  • 4th Apr 2026

    बंदर के हाथों में उस्तरा!

    बंदर के हाथों में उस्तरा देने की कहावत हम सभी ने सुनी है, लेकिन अब लगता है कि दुनिया का महान लोकतंत्र कहलाने वाले अमरीका की जनता ने भी इस बार फिर से ट्रंप नाम के व्यापारी को राष्ट्राध्यक्ष चुनकर बंदर के हाथों में उस्तरा थमा दिया है। यह बड़बोला नेता इस बार जिस तरह…

  • 4th Apr 2026

    नाज़ था जिस पे !

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं, अपने स्वर में मुकेश जी का एक उदासी भरा गीत शेयर कर रहा हूँ जो टुटे हुए दिल के दर्द को बहुत मधुर किंतु प्रभावी तरीके से अभिव्यक्त करता है- नाज़ था जिस पे मेरे सीने में वो दिल ही नहीं! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद…

  • 4th Apr 2026

    जब दुपहरी ज़िन्दगी पर!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता – जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरजएक जॉबर-साबराबर रौब अपना गाँठता-सा हैकि रोज़ी छूटने का डर हमेंफटकारता-सा…

  • 3rd Apr 2026

    मौत ने सारी रात!

    मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली,ऐसा मरने का माहौल बनाया हम ने| शारिक़ कैफ़ी

  • 3rd Apr 2026

    अपने अलावा किस को!

    भीड़ ने यूँही रहबर मान लिया है वर्ना,अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हम ने| शारिक़ कैफ़ी

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