अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज अपने स्वर में एक खूबसूरत नज़्म की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मैंने बहुत पहले डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब के एक उपन्यास में पढी थीं आउर मुझे अभी तक याद हैं-
तेज़ चलने लगी गुर्बत में हवा, गर्द जमने लगी आईने पर!
आशा है आपको यह पसंद आएंगी,
धन्यवाद।
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