
बंदर के हाथों में उस्तरा देने की कहावत हम सभी ने सुनी है, लेकिन अब लगता है कि दुनिया का महान लोकतंत्र कहलाने वाले अमरीका की जनता ने भी इस बार फिर से ट्रंप नाम के व्यापारी को राष्ट्राध्यक्ष चुनकर बंदर के हाथों में उस्तरा थमा दिया है।
यह बड़बोला नेता इस बार जिस तरह के कदम उठा रहा है वे शायद शुरु में कुछ लोगों को अच्छे लगे हों लेकिन अब लगता है कि यह इंसान दुनिया को और अमरीका को भी बर्बादी की ओर ले जा रहा है। अब तो पाषाण युग जैसी हरकतें करने वाला यह नेता ऐसा बोलने भी लगा है कि वह ईरान को पाषाण युग में ले जाएगा।
इस कवायद में एक बात और हो रही है, ईरान अमरीका के तो केवल सैन्य ठिकानों पर ही हमले कर रहा है, जो खाड़ी देशों में हैं लेकिन इस कारण लगता है कि मुस्लिम देशों की दुनिया, जिसका अघोषित लक्ष्य रहा है कि पूरी दुनिया में मुस्लिम शासन फैलाया जाएगा, वे ही आपस में युद्ध करके बर्बाद हो रहे हैं। इस प्रकार केवल ईरान पाषाण युग में नहीं जा रहा है अपितु खाड़ी के अन्य देशों के साथ भी यही होने वाला है।
वैसे देखा जाए तो महान लोकतंत्र कहलाने वाले अमरीका के शासकों के इरादे कभी पवित्र नहीं रहे हैं। उनका हमेशा से यह प्रयास रहा है कि सभी देशों में ऐसी सरकारें हों जो उनके इशारों पर काम करें, लेकिन इसके लिए वे अब तक अपनी सेनाओं का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, अपने पैसे का इस्तेमाल करके, लोगों को उकसाकर ही उन्होंने अनेक देशों में लोगों को आपस में ही लड़ मरने पर मजबूर किया, श्रीलंका, नेपाल और बंगलादेश में सरकारों को गिराया और मोहम्मद यूनुस जैसे नोबल पुरस्कार धारी कठपुतलों को गद्दी पर बिठाया जिनके माथे पर, धर्म के आधार पर लोगों की हत्या किए जाने पर भी कोई शिकन नहीं आती थी।
वैसे अमरीका ने भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए भी बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी तक वो सफल नहीं हो पाया है यद्यपि आज भारत की राजनीति में बहुत से ऐसे नेता हैं जिनको अमरीका ने ही आगे बढाया है, बस इस बारे में ज्यादा बात करना खतरे से खाली नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट रूप से नहीं देखा जा सका है। जब जयप्रकाश जी का आंदोलन चल रहा था तब यह कहा गया कि इसके पीछे अमरीका का भी हाथ है, इस पर कहा गया कि क्या जयप्रकाश जी इसके लिए मान सकते हैं, तो सर जी ऐसा भी होता है कि जो लोग आंदोलन को संचालित कर रहे हैं, उनको मालूम भी न हो अमरीका के दखल के बारे में, यह दखल किसी भी स्तर पर, किसी भी आंदोलन में हो सकता है और होता है, अगर अमरीका की उसमें रुचि हो, ऐसा कहा जाता है कि पति-पत्नी को नहीं मालूम होता अगर उनमें से कोई सीआईए का एजेंट हो या उनके रोल पर हो।
खैर मैं आज की बात कर रहा था, खाड़ी युद्ध में अमरीका का तो मुख्यतः पैसे का ही नुकसान हो रहा है, खाड़ी देशों में स्थित उसके सैन्य अड्डे तबाह हो रहे हैं, कुछ सैनिक भी मारे जाएंगे लेकिन असली नुकसान तो उसके उकसाने पर आपस में लड़ने वाले इज़राइल, ईरान और अन्य मुस्लिम देश उठा रहे हैं जहाँ अमरीका के सैन्य अड्डे हैं।
लोकतंत्र की सच्ची भावना वाले किसी देश की सोच यही होनी चाहिए कि सभी देश आगे बढें, प्रगति करें। सैन्य ठिकानों पर आक्रमण की बात भी समझ में आती है लेकिन आधुनिक प्रगति के प्रतीक शानदार पुल जो जनता के आवागमन में काम आते हैं उनको ध्वस्त करना किस लोकतंत्रिक राष्ट्राध्यक्ष को शोभा देता है, इसका इसी प्रकार का जवाब दिया जाएगा मतलब यह कि हमारी दुनिया सदियों पीछे चली जाएगी! लेकिन अमरीका को तो इसमें भी अवसर दिखाई देता है वह अपने लिए हथियारों और अन्य इंजीनियरिंग सप्लाई के लिए नए बाजार खोज पाएगा।
वैसे देखा जाए तो अमरीका की सभी सरकारों के इरादे इसी प्रकार के रहे हैं लेकिन कोई अमरीकी खलीफा इतने निचले स्तर पर नहीं उतरा था जो यह कहे कि मैं उनको पाषाण युग में ले जाना चाहता हूँ।
ईश्वर इस पगलाए विश्व नेता को सद्बुद्धि दें।
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