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ये कहाँ की दोस्ती है!
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह,कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता| मिर्ज़ा ग़ालिब
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जो जिगर के पार होता!
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को,ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता| मिर्ज़ा ग़ालिब
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कारवां गुज़र गया-8
मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रस्तुत है नीरज जी के लिखे, मोहम्मद रफी जी के गाये ‘नई उमर की नई फसल’ इस प्रसिद्ध का अगला भाग- कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे-8 आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद । ********
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तिरे वा’दे पर जिए हम!
तिरे वा’दे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता| मिर्ज़ा ग़ालिब
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ये न थी हमारी क़िस्मत!
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता| मिर्ज़ा ग़ालिब
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हमको मन की शक्ति देना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में यह प्रार्थना प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे गुलज़ार साहब ने लिखा थ और वसंत देसाई जी के संगीत निर्देशन में गुड्डी फिल्म के लिए वाणी जयराम जी ने गाया था- हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें! आशा है आपको मेरा यह वीडिओ…
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एक मुद्दत से मिरी!
एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’,मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है| अब्बास ताबिश
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दूर कटा कवि मैं जनता का !
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की यह कविता – दूर कटा कविमैं जनता का, कच-कच करताकचर रहा हूँ अपनी माटी;मिट-मिट करमैं सीख रहा हूँगतिपल जीने की परिपाटी…
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तस्दीक़ कराए जाकर!
अपने शजरे* कि वो तस्दीक़ कराए जा कर,जिस को ज़ंजीर पहनते हुए डर लगता है|*वंश अब्बास ताबिश
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ओढ़ लेता हूँ तो सब!
वक़्त लफ़्ज़ों से बनाई हुई चादर जैसा,ओढ़ लेता हूँ तो सब ख़्वाब हुनर लगता है| अब्बास ताबिश