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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Jan 2025

    इबादत छीन लेती है|!

    रिया-कारी* से बचिए ये बहुत ज़हरीली नागिन है,ये नागिन ज़िंदगी भर की ‘इबादत छीन लेती है| *Hypocaracy आलम निज़ामी

  • 6th Jan 2025

    शराफ़त छीन लेती है!

    शराफ़त छीन लेती है सदाक़त छीन लेती है,क़लमकारों से ख़ुद्दारी ज़रूरत छीन लेती है| आलम निज़ामी

  • 6th Jan 2025

    आ के सदा दे कोई!

    साँस रोके हुए बैठे हैं मकानों में मकीं,जाने कब और किसे आ के सदा दे कोई| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jan 2025

    रंग के कोहरे की!

    दूसरी सम्त हैं ख़ुशबू के उफ़ुक़ की सुब्हें,रंग के कोहरे की दीवार गिरा दे कोई| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jan 2025

    जैसे सन्नाटे में !

    यूँ तुझे देख के चौंक उठती हैं सोई यादें,जैसे सन्नाटे में आवाज़ लगा दे कोई| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jan 2025

    तस्वीर बना दे कोई!

    दिल की तख़्ती सर-ए-बाज़ार लिए फिरता हूँ,काश इस पर तिरी तस्वीर बना दे कोई| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jan 2025

    नज़रों से छुपा दे कोई!

    ढूँढता फिरता हूँ यूँ अपने ही क़दमों के निशाँ,जैसे मुझ को मिरी नज़रों से छुपा दे कोई| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jan 2025

    मुझे मेरा पता दे कोई!

    ग़रज़ इस से नहीं वो कौन है किस भेस में है,मैं कहाँ पर हूँ मुझे मेरा पता दे कोई| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jan 2025

    आंधी!

    आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री लीलाधर जगूड़ी जी की यह कविता – रात वह हवा चली जिसे आँधी कहते हैंउसने कुछ दरवाजे भड़भड़ाएकुछ खिड़कियाँ झकझोरीं, कुछ पेड़ गिराएकुछ जानवरों…

  • 5th Jan 2025

    मेरी आँखों को मिरी!

    मेरी आँखों को मिरी शक्ल दिखा दे कोई, काश मुझ को मिरा एहसास दिला दे कोई| नज़ीर क़ैसर

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