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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Jun 2025

    दूसरा दर्जा!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री हेमंत शेष जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| हेमंत जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री हेमंत शेष जी की यह कविता – दोपहर का वक़्त था वहपर ठीक दोपहर जैसा नहीं,नदी जैसी कोई चीज़ भागती हुई खिड़की से बाहरसूख…

  • 20th Jun 2025

    सोचता रोज़ हूँ मैं!

    शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है, सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    मेरी तन्हाई की!

    मेरी तन्हाई की रुस्वाई की मंज़िल आई,वस्ल के लम्हे से मैं हिज्र की शब बदलूँगा। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा!

    देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है,आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    दरवाज़ा खुला रक्खूँगा!

    तेरे वा’दे को कभी झूट नहीं समझूँगा,आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    अजीब चीज़ है ये!

    अजीब चीज़ है ये वक़्त जिस को कहते हैं,कि आने पाता नहीं और बीत जाता है। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    ये एक दाग़ जो!

    तिरे करम की यही यादगार बाक़ी है,ये एक दाग़ जो इस दिल में जगमगाता है। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    मगर ये क्या कि!

    जगह जो दिल में नहीं है मिरे लिए न सही,मगर ये क्या कि भरी बज़्म से उठाता है। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    न ख़ुश-गुमान हो!

    न ख़ुश-गुमान हो इस पर तू ऐ दिल-ए-सादा,सभी को देख के वो शोख़ मुस्कुराता है। शहरयार

  • 20th Jun 2025

    मगर हमें तो वही!

    वो बेवफ़ा है हमेशा ही दिल दुखाता है,मगर हमें तो वही एक शख़्स भाता है। शहरयार

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