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सूइयाँ चुभोते रहे|!
हमी को शौक़ था दुनिया के देखने का बहुत,हम अपनी आँखों में ख़ुद सूइयाँ चुभोते रहे| शमीम हनफ़ी
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एक छलावा!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की, बापू पर लिखी यह कविता – बापू !तुम मानव तो नहीं थेएक छलावा थेकर दिया था तुमने…
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कभी जीना कभी!
न रास आएगी जीने की अदा शायद कभी हम को,कभी जीना कभी जीने के ढब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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मगर कुछ लोग यूँ ही!
ये कह देना कि उन से कुछ गिला-शिकवा नहीं हम को,मगर कुछ लोग यूँ ही बे-सबब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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कभी अपनी गली के!
तो ये होता है हम घर से निकलना छोड़ देते हैं,कभी अपनी गली के लोग जब अच्छे नहीं लगते|
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उजाले में हमें सूरज!
उजाले में हमें सूरज बहुत अच्छा नहीं लगता,सितारे भी सर-ए-दामान-ए-शब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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लक़ड़हारे तुम्हारे खेल!
लक़ड़हारे तुम्हारे खेल अब अच्छे नहीं लगते,हमें तो ये तमाशे सब के सब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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फालतू चीज़!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री विष्णु नागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहींकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विष्णु नागर जी की यह कविता – घर में कोई चीज़फालतू नहीं थीटूटा कंघा लगता थाअमर हैभरोसा था अब खोएगा भी नहीं घड़ी बंद…