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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Jan 2025

    सूइयाँ चुभोते रहे|!

    हमी को शौक़ था दुनिया के देखने का बहुत,हम अपनी आँखों में ख़ुद सूइयाँ चुभोते रहे| शमीम हनफ़ी

  • 10th Jan 2025

    एक छलावा!

    आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की, बापू पर लिखी यह कविता – बापू !तुम मानव तो नहीं थेएक छलावा थेकर दिया था तुमने…

  • 9th Jan 2025

    हँसी भी आई मगर!

    कोई तो बात थी ऐसी कि इस तमाशे पर, हँसी भी आई मगर मुँह छुपा के रोते रहे| शमीम हनफ़ी

  • 9th Jan 2025

    किताब पढ़ते रहे!

    किताब पढ़ते रहे और उदास होते रहे,अजीब शख़्स था जिस के अज़ाब ढोते रहे| शमीम हनफ़ी

  • 9th Jan 2025

    कभी जीना कभी!

    न रास आएगी जीने की अदा शायद कभी हम को,कभी जीना कभी जीने के ढब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी

  • 9th Jan 2025

    मगर कुछ लोग यूँ ही!

    ये कह देना कि उन से कुछ गिला-शिकवा नहीं हम को,मगर कुछ लोग यूँ ही बे-सबब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी

  • 9th Jan 2025

    कभी अपनी गली के!

    तो ये होता है हम घर से निकलना छोड़ देते हैं,कभी अपनी गली के लोग जब अच्छे नहीं लगते|

  • 9th Jan 2025

    उजाले में हमें सूरज!

    उजाले में हमें सूरज बहुत अच्छा नहीं लगता,सितारे भी सर-ए-दामान-ए-शब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी

  • 9th Jan 2025

    लक़ड़हारे तुम्हारे खेल!

    लक़ड़हारे तुम्हारे खेल अब अच्छे नहीं लगते,हमें तो ये तमाशे सब के सब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी

  • 9th Jan 2025

    फालतू चीज़!

    आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री विष्णु नागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहींकी हैं।                            लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विष्णु नागर जी की यह कविता  – घर में कोई चीज़फालतू नहीं थीटूटा कंघा लगता थाअमर हैभरोसा था अब खोएगा भी नहीं घड़ी बंद…

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