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ख़ुश्क भी न हो पाई!
ख़ुश्क भी न हो पाई रौशनाई हर्फ़ों की,जान-ए-मन मुकरने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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हादिसा भी होने में !
हादिसा भी होने में वक़्त कुछ तो लेता है,बख़्त के बिगड़ने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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आँख के झपकने में!
आँख से न हटना तुम आँख के झपकने तक,आँख के झपकने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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रास्ते बदलने में!
हिज्र के दोराहे पर एक पल न ठहरा वो,रास्ते बदलने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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दूरियाँ सिमटने में!
दूरियाँ सिमटने में देर कुछ तो लगती है,रंजिशों के मिटने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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प्रलाप!
एक बार फिर से आज मैं छायावाद युग से एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। निराला जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता– वीणानिन्दित वाणी बोल!संशय-अन्धकारमय पथ पर भूला प्रियतम तेरा–सुधाकर-विमल…
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इस तरह सोए हैं!
इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर,अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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बेवफ़ा लिखते हैं वो!
बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को,ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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लाख करूँगा सज्दे!
नक़्श-ए-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सज्दे,सर मिरा अर्श नहीं है जो झुका भी न सकूँ| अमीर मीनाई
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कि उसे हाल सुनाऊँ!
ज़ब्त कम-बख़्त ने याँ आ के गला घोंटा है,कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ| अमीर मीनाई