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कोई आइना हो जो!
कोई आइना हो जो ख़ुद से मुझ को मिला सके,मिरा अपने-आप से सामना नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल
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रास्ता नहीं हो रहा!
तिरी सम्त जाने का रास्ता नहीं हो रहा,रह-ए-इश्क़ में कोई मो’जिज़ा* नहीं हो रहा|*करिश्मा अज़हर इक़बाल
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जुनूँ के वास्ते !
हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है,जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या| अज़हर इक़बाल
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फ़रेब खाना क्या!
खड़े हुए हो मियाँ गुम्बदों के साए में,सदाएँ दे के यहाँ पर फ़रेब खाना क्या| अज़हर इक़बाल
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याद के दीपक!
तुम्हारी याद के दीपक भी अब जलाना क्या,जुदा हुए हैं तो अहद-ए-वफ़ा निभाना क्या| अज़हर इक़बाल
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समुद्र का पानी!
एक बार फिर से आज मैं राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति प्राप्त, ओज और शृंगार दोनो प्रकार की अनेक अमर रचनाएं देने वाले कवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। दिनकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर…
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लकड़ियाँ सुलगने में!
मुस्तक़िल नहीं ‘अमजद’ ये धुआँ मुक़द्दर का,लकड़ियाँ सुलगने में देर कुछ तो लगती है|
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हुस्न के सँवरने में !
हो चमन के फूलों का या किसी परी-वश का,हुस्न के सँवरने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद