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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Jun 2025

    भीड़ वक़्त लेती है!

    भीड़ वक़्त लेती है रहनुमा परखने में,कारवान बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 27th Jun 2025

    सोचने समझने में !

    ज़लज़ले की सूरत में इश्क़ वार करता है,सोचने समझने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 27th Jun 2025

    तितलियाँ पकड़ने में!

    उन की और फूलों की एक सी रिदाएँ हैं,तितलियाँ पकड़ने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 27th Jun 2025

    रंग यूँ तो होते हैं!

    रंग यूँ तो होते हैं बादलों के अंदर ही,पर धनक के बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 27th Jun 2025

    ज़िंदगी समझने में!

    उम्र-भर की मोहलत तो वक़्त है तआ’रुफ़ का,ज़िंदगी समझने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 27th Jun 2025

    ख़्वाहिशें परिंदों से!

    ख़्वाहिशें परिंदों से लाख मिलती-जुलती हों,दोस्त पर निकलने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 27th Jun 2025

    सुधि!

    एक बार फिर से आज मैं छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। महादेवी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का यह गीत– किस सुधिवसन्त का सुमनतीर,कर गया मुग्ध मानस अधीर? वेदना गगन…

  • 26th Jun 2025

    सीढ़ियाँ उतरने में!

    दस्तकें भी देने पर दर अगर न खुलता हो, सीढ़ियाँ उतरने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 26th Jun 2025

    दास्तान बनने में!

    दर्द की कहानी को इश्क़ के फ़साने को,दास्तान बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद

  • 26th Jun 2025

    बात है क़बीले की!

    फ़र्द*की नहीं है ये बात है क़बीले की,गिर के फिर सँभलने में देर कुछ तो लगती है|*Person अमजद इस्लाम अमजद

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