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दिखाई देता है जो!
निगाह-ए-आईना मालूम अक्स ना-मालूम,दिखाई देता है जो असल में छुपा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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कहीं हवा ही न हो!
सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो,किवाड़ खोल के देखो कहीं हवा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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दिल्ली में!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – कारों की रेस मेंशामिल बैलगाड़ियाँख़ुश है घोड़ागाड़ियों को देख करसभ्यता का विकास बरकरार है यहाँसर…
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बात क्या फिर कोई!
चल पड़ी रस्म जो कज-फ़हमी* की,बात क्या फिर कोई कर पाएगा| *Misunderstanding क़तील शिफ़ाई