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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Jul 2025

    जाड़े की धूप!

    एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता– बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया ताते जल नहा पहन श्वेत वसन…

  • 6th Jul 2025

    कि मैं तो ख़ुशबू था!

    बिखर के जाता कहाँ तक कि मैं तो ख़ुशबू था,हवा चली थी मुझे अपने हम-रिकाब लिए| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jul 2025

    गुज़र गया कोई!

    गुज़र गया कोई पहचानता हुआ मुझ को,पुरानी यादों की शमएँ पस-ए-नक़ाब लिए| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jul 2025

    तू ढूँडने मुझे निकला !

    मैं एक ढलता सा साया ज़मीं के क़दमों में,तू ढूँडने मुझे निकला है आफ़्ताब लिए| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jul 2025

    हाथ में गुलाब लिए!

    शब-ए-सियाह ढली सुब्ह आश्कार हुई,जबीं पे ज़ख़्म लिए हाथ में गुलाब लिए| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jul 2025

    हवाएँ फैल गईं!

    घरों में सब्ज़ा छतों पर गुल-ए-सहाब लिए,हवाएँ फैल गईं नक़्श-ओ-रंग-ए-आब लिए| नज़ीर क़ैसर

  • 6th Jul 2025

    सर-फिरी मौजें अभी!

    कौन ये पाताल से उभरा किनारे पर ‘सलीम’,सर-फिरी मौजें अभी तक दाएरों में क़ैद हैं| सलीम कौसर

  • 6th Jul 2025

    ख़ाक उड़ती है हवा!

    इस जज़ीरे पर अज़ल से ख़ाक उड़ती है हवा,मंज़िलों के भेद फिर भी रास्तों में क़ैद हैं| सलीम कौसर

  • 6th Jul 2025

    फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ !

    ये ज़मीं यूँही सिकुड़ती जाएगी और एक दिन,फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ साहिलों में क़ैद हैं| सलीम कौसर

  • 6th Jul 2025

    अपने घरों में क़ैद हैं!

    पाँव में रिश्तों की ज़ंजीरें हैं दिल में ख़ौफ़ की,ऐसा लगता है कि हम अपने घरों में क़ैद हैं| सलीम कौसर

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