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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Jul 2025

    सोचता कोई और है!

    मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है,सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है| सलीम कौसर

  • 5th Jul 2025

    शून्य होकर!

    एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता– शून्य होकरबैठ जाता है जैसेउदास बच्चा उस दिन उतना अकेलाऔर असहाय बैठा दिखाशाम…

  • 4th Jul 2025

    वो और हम से पूछे!

    वो और हम से पूछे कि ‘बिल्क़ीस’ कुछ तो कह,कम-बख़्त हम कि होश ही अपने बजा न थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

  • 4th Jul 2025

    तेरे करम के हाथ!

    क्यूँ सब्र-आश्ना न हुआ ना-मुराद दिल, तेरे करम के हाथ तो यूँ बे-अता न थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

  • 4th Jul 2025

    हरगिज़ गिला नहीं है !

    हरगिज़ गिला नहीं है कि तू मेहरबाँ न था,कब हम भी अपने आप से बेहद ख़फ़ा न थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

  • 4th Jul 2025

    दरिया में रह के !

    दरिया में रह के कोई न भीगे तो किस तरह,हम बे-नियाज़ तेरी तरह ऐ ख़ुदा न थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

  • 4th Jul 2025

    ये और बात शौक़ से!

    ये और बात शौक़ से हम को सुना गया,फिर भी वही सुनाया सुना इक फ़साना थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

  • 4th Jul 2025

    चुपके जला करो!

    कितना कहा था तुम से कि मत खेलो आग से,अब जो सुलग पड़ी है तो चुपके जला करो| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

  • 4th Jul 2025

    रख़्त-ए-सफ़र में!

    है बस-कि ख़ाक उड़ाने की आवारगी को खो,रख़्त-ए-सफ़र में घर को भी बाँधे फिरा करो| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

  • 4th Jul 2025

    कभी सो लिया करो!

    ये बार-ए-ज़ीस्त झेलते रहना है उम्र-भर,अपनी थकन पे टिक के कभी सो लिया करो| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

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