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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Apr 2025

    वक़्त बदला तो तिरी!

    मेरी ग़ुर्बत को शराफ़त का अभी नाम न दे,वक़्त बदला तो तिरी राय बदल जाएगी| निदा फ़ाज़ली

  • 1st Apr 2025

    नींद कहाँ आएगी!

    और कुछ देर यूँही जंग सियासत मज़हब,और थक जाओ अभी नींद कहाँ आएगी| निदा फ़ाज़ली

  • 1st Apr 2025

    मोड़ पे डस जाएगी!

    जगमगाती हुई सड़कों पे अकेले न फिरो,शाम आएगी किसी मोड़ पे डस जाएगी| निदा फ़ाज़ली

  • 1st Apr 2025

    और चमक जाएगी!

    हँसते हँसते कभी थक जाओ तो छुप के रो लो,ये हँसी भीग के कुछ और चमक जाएगी| निदा फ़ाज़ली

  • 1st Apr 2025

    तारीख़ बदल जाएगी!

    रात के बा’द नए दिन की सहर आएगी,दिन नहीं बदलेगा तारीख़ बदल जाएगी| निदा फ़ाज़ली

  • 1st Apr 2025

    सितम के दौर में हम!

    सितम के दौर में हम अहल-ए-दिल ही काम आए,ज़बाँ पे नाज़ था जिन को वो बे-ज़बाँ निकले| साहिर लुधियानवी

  • 1st Apr 2025

    उधर भी ख़ाक उड़ी!

    उधर भी ख़ाक उड़ी है इधर भी ख़ाक उड़ी,जहाँ जहाँ से बहारों के कारवाँ निकले| साहिर लुधियानवी

  • 1st Apr 2025

    अब मत सोचो!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। ठाकुर प्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – अब मत सोचो प्रिय रे, अब मत सोचोआँखों के जल को…

  • 31st Mar 2025

    ख़्वाब राएगाँ निकले!

    हक़ीक़तें हैं सलामत तो ख़्वाब बहुतेरे,मलाल क्यूँ हो कि कुछ ख़्वाब राएगाँ निकले| साहिर लुधियानवी

  • 31st Mar 2025

    अरमाँ अभी कहाँ!

    फ़क़ीर-ए-शहर के तन पर लिबास बाक़ी है,अमीर-ए-शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले| साहिर लुधियानवी

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