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तहज़ीब की आँखों से!
तहज़ीब की आँखों से दिन-रात लहू छलका,पत्थर की हवेली में यूँ लुटता रहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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दरिया से जुदा होकर!
दरिया से जुदा होकर बाज़ार में आ पहुँचा,बादल न जो बन पाया बोतल में बिका पानी। सूर्यभानु गुप्त
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पानी में बही बस्ती!
लोगों ने कभी ऐसा, देखा न सुना पानी,पानी में बही बस्ती, बस्ती में बहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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सागर से बग़ावत पर!
सागर से बग़ावत पर जब ज़िद पे अड़ा पानी,उस वक़्त सुनामी के पैकर में ढला पानी। सूर्यभानु गुप्त
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पानी पे चढ़ा पानी!
आकाश फटा ऐसा धरती ने भरा पानी,बरखा ने हदें तोड़ीं, पानी पे चढ़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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इक शोर उठा, पानी!
पर्वत के ज़ुबां फूटी, इक शोर उठा, पानी!मन्ज़र पे बना मन्ज़र, पानी पे गिरा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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ढूँढ़े न मिला पानी!
आँखों में पड़े छाले, छालों से बहा पानी,इस दौर के सहरा में, ढूँढ़े न मिला पानी। सूर्यभानु गुप्त
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स्वामी नारायण मंदिर, आबू धाबी!
दुबई में यह पहला सप्ताहांत, रविवार का दिन, 26 जनवरी, सुबह टी.वी. पर गणतंत्र दिवस की परेड देखी और उसके बाद नाश्ता करके लगभग 12 बजे, भारतीय समय 1-30 बजे के आसपास आबू धाबी की ओर रवाना हुए, स्वामी नारायण मंदिर देखने के लिए, जो घर से लगभग 85 किलोमीटर है। भारत में जहाँ अधिकतर…
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ख़याल दिल को मिरे!
गुज़र गया वो ज़माना कहूँ तो किस से कहूँ,ख़याल दिल को मिरे सुब्ह ओ शाम किस का था| दाग़ देहलवी