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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Jul 2025

    गुल हैं मगर !

    अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं| *कटी हुई शाखा चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    मत कर यों बदनाम!

    एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत– मत कर यों बदनाम मुझे तू व्यर्थ सहेली बावरी,देखी तक भी नहीं आज…

  • 11th Jul 2025

    जो दाग़ आसमाँ के हैं!

    हम सोचते हैं रात में तारों को देख करशमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं चकबस्त बृज नारायण

  • 11th Jul 2025

    पर बड़ी बात पे!

    छोटी सी बात पे ख़ुश होना मुझे आता था,पर बड़ी बात पे चुप रहना तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह

  • 11th Jul 2025

    रिश्ता-ए-नाज़ को!

    रिश्ता-ए-नाज़ को जाना भी तो तुम से जाना,जामा-ए-फ़ख़्र पहनना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह

  • 11th Jul 2025

    सोच को आदाब!

    तुम ने समझाए मिरी सोच को आदाब अदब,लफ़्ज़ ओ मअनी से उलझना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह

  • 11th Jul 2025

    अच्छे शेरों की परख!

    अच्छे शेरों की परख तुम ने ही सिखलाई मुझे,अपने अंदाज़ से कहना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह

  • 11th Jul 2025

    तुमसे हासिल हुआ!

    तुम से हासिल हुआ इक गहरे समुंदर का सुकूत,और हर मौज से लड़ना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह

  • 11th Jul 2025

    नक़्श की तरह!

    नक़्श की तरह उभरना भी तुम्ही से सीखा,रफ़्ता रफ़्ता नज़र आना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह

  • 11th Jul 2025

    बातें अखबारी रख!

    उदय ह्रदय के अनुभव सुन,ये बातें अखबारी रख। उदयप्रताप सिंह

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