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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Jul 2025

    लोग यों तो रोज़ ही!

    लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे,आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र

  • 14th Jul 2025

    था पढ़ाया मांज कर!

    था पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिन,हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र

  • 14th Jul 2025

    आज फिर लौटा!

    आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में,हो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र

  • 14th Jul 2025

    बौने बड़े दिखने लगे हैं!

    एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत– नज़रिए हो गये छोटे हमारेमगर बौने बड़े दिखने लगे हैचले इंसानियत की राह…

  • 13th Jul 2025

    सिर किये ऊँचा खड़ी!

    आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा,सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र

  • 13th Jul 2025

    वतन की ख़ाक से!

    वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है,मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 13th Jul 2025

    नई तहज़ीब के झगड़े!

    पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है,नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 13th Jul 2025

    न बतलाई किसी ने!

    न बतलाई किसी ने भी हक़ीक़त राज़-ए-हस्ती की,बुतों से जा के सर फोड़ा बहुत दैर-ए-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 13th Jul 2025

    अँधेरी रात में मोती!

    नहीं होता है मुहताज-ए-नुमाइश फ़ैज़ शबनम का,अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 13th Jul 2025

    शबाब आया है!

    शबाब आया है पैदा रंग है रुख़्सार-ए-नाज़ुक से,फ़रोग़-ए-हुस्न कहता है सहर होती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

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