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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Jul 2025

    शराब-ए-हुस्न को !

    शराब-ए-हुस्न को कुछ और ही तासीर देता है,जवानी के नुमू से बे-ख़बर होना लड़कपन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 13th Jul 2025

    शहीद-ए-यास हूँ!

    शहीद-ए-यास हूँ रुस्वा हूँ नाकामी के हाथों से,जिगर का चाक बढ़ कर आ गया है मेरे दामन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 13th Jul 2025

    जीवन क्रम : तीन चित्र!

    एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नंदन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की यह कविता– रेशमी कंगूरों परनर्म धूप सोयी।मौसम नेनस-नस मेंनागफनी बोयी!दोषों के खाते में…

  • 12th Jul 2025

    तरसते अब हैं पानी!

    जिन्हें सींचा था ख़ून-ए-दिल से अगले बाग़बानों ने,तरसते अब हैं पानी को वो पौदे मेरे गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    असीरी लाज़मी है!

    यहाँ तस्बीह का हल्क़ा वहाँ ज़ुन्नार का फंदा,असीरी लाज़मी है मज़हब-ए-शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    सैकड़ों मोती हैं!

    ज़माने में नहीं अहल-ए-हुनर का क़द्र-दाँ बाक़ी,नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    बहार आई है!

    हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है,क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    तिरी क़ुदरत से वो!

    गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में,तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    शजर सकते में हैं!

    शजर सकते में हैं ख़ामोश हैं बुलबुल नशेमन में,सिधारा क़ाफ़िला फूलों का सन्नाटा है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    सिलसिला हवस का!

    इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी,इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं| चकबस्त बृज नारायण

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