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मिट्टी में मिली मिट्टी!
हर एक सिकन्दर का अन्जाम यही देखा,मिट्टी में मिली मिट्टी, पानी में मिला पानी। सूर्यभानु गुप्त
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रातों का तसव्वुर है!
आज मैं विख्यात शायर स्वर्गीय साग़र निज़ामी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। साग़र निज़ामी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय साग़र निज़ामी जी की यह ग़ज़ल – रातों का तसव्वुर है उनका और चुपके-चुपके रोना है ।ऐ सुब्ह के तारे तू ही…
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काँधों पे रहा चेहरा!
जन्नत थी मगर हमको झुक कर न उठानी थी,काँधों पे रहा चेहरा, चेहरे पे रहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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इक मोम के चोले में!
इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया,अपने ही गले लग कर रोने की सज़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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तारीख़ बना पानी!
इस दुनिया में रहकर भी दुनिया में नहीं रहना,जिस दिन ये हुनर आया, तारीख़ बना पानी। सूर्यभानु गुप्त
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घर छोड़के निकलें तो!
घर छोड़के निकलें तो संसार के काम आएँ,कब धूप को पहने बिन बनता है घटा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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य़ूँ जम के गिरा पानी!
अँगनाई से तन-मन तक कुछ भी न बचा कोरा,इस बार के सावन में य़ूँ जम के गिरा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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दो शख़्स मिले ऐसे!
दस्तक दी दरे-दिल पर बरसात के मौसम ने,दो शख़्स मिले ऐसे जैसे कि हवा-पानी। सूर्यभानु गुप्त
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हमने तो लिखा बादल!
हर लफ़्ज़ का मानी से रिश्ता है बहुत गहरा,हमने तो लिखा बादल और उसने पढ़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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सहरा में जला पानी!
जब प्यास अँधेरों के घर बैठ गई जाकर,जलते हैं दीये जैसे सहरा में जला पानी। सूर्यभानु गुप्त