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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Apr 2025

    मैं शाहराह नहीं!

    मैं शाहराह नहीं रास्ते का पत्थर हूँ,यहाँ सवार भी पैदल उतर के चलते हैं| बशीर बद्र

  • 3rd Apr 2025

    घने धुएँ में फ़रिश्ते भी!

    घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं,तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं| बशीर बद्र

  • 3rd Apr 2025

    आदमी खजूर हो गए!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ पत्रकार और कवि स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। तारादत्त निर्विरोध जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की यह ग़ज़ल – आदमी खजूर हो गएदूर और दूर हो गए कल मिले इनाम जो हमेंआज…

  • 2nd Apr 2025

    सीपियों में पलते हैं!

    उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं, ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं| बशीर बद्र

  • 2nd Apr 2025

    बाक़ी जो कुछ है!

    इश्क़ की उम्र कम ही होती है,बाक़ी जो कुछ है दोस्ताना है| निदा फ़ाज़ली

  • 2nd Apr 2025

    उसका आस्ताना है!

    कैसी मस्जिद कहाँ का बुत-ख़ाना,हर जगह उस का आस्ताना है| निदा फ़ाज़ली

  • 2nd Apr 2025

    देस परदेस क्या!

    देस परदेस क्या परिंदों का,आब-ओ-दाना ही आशियाना है| निदा फ़ाज़ली

  • 2nd Apr 2025

    मंज़र सदा नहीं रहता!

    कोई मंज़र सदा नहीं रहता,हर तअ’ल्लुक़ मुसाफ़िराना है| निदा फ़ाज़ली

  • 2nd Apr 2025

    ये जो फैला हुआ!

    ये जो फैला हुआ ज़माना है,इस का रक़्बा ग़रीब-ख़ाना है| निदा फ़ाज़ली

  • 2nd Apr 2025

    नदियों को उछाले!

    वक़्त नदियों को उछाले कि उड़ाए पर्बत,उम्र का काम गुज़रना है गुज़र जाएगी| निदा फ़ाज़ली

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