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घने धुएँ में फ़रिश्ते भी!
घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं,तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं| बशीर बद्र
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आदमी खजूर हो गए!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ पत्रकार और कवि स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। तारादत्त निर्विरोध जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की यह ग़ज़ल – आदमी खजूर हो गएदूर और दूर हो गए कल मिले इनाम जो हमेंआज…
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सीपियों में पलते हैं!
उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं, ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं| बशीर बद्र
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नदियों को उछाले!
वक़्त नदियों को उछाले कि उड़ाए पर्बत,उम्र का काम गुज़रना है गुज़र जाएगी| निदा फ़ाज़ली