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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Jun 2025

    मुझे सँभाल ले!

    इससे पहले कि मैं बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ,मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 13th Jun 2025

    सिसकियाँ उस की न !

    सिसकियाँ उस की न देखी गईं मुझ से ‘रा’ना’,रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते| मुनव्वर राना

  • 13th Jun 2025

    वर्ना हम और तुझे!

    इन सिसकते हुए रिश्तों के कहाँ थे क़ाइल,वर्ना हम और तुझे दाग़-ए-जुदाई देते| मुनव्वर राना

  • 13th Jun 2025

    बंदिशें रोने लगीं!

    साथ रहने से भी खिल जाते हैं रिश्तों के कँवल,बंदिशें रोने लगीं मुझ को रिहाई देते| मुनव्वर राना

  • 13th Jun 2025

    घर में डरते थे!

    कहीं बे-नूर न हो जाएँ वो बूढ़ी आँखें,घर में डरते थे ख़बर भी मिरे भाई देते| मुनव्वर राना

  • 13th Jun 2025

    कौन!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शलभ जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – कौन ले जा रहा है मनुष्य कोसामूहिक आत्मघात की दिशा में बिला झिझक?सभ्यता कोध्वंसावशेषों…

  • 12th Jun 2025

    सूने पनघट का!

    सूने पनघट का कोई दर्द-भरा गीत थे हम, शहर के शोर में क्या तुझ को सुनाई देते| मुनव्वर राना

  • 12th Jun 2025

    बच्चे को मिठाई देते!

    कुछ खिलौने कभी आँगन में दिखाई देते,काश हम भी किसी बच्चे को मिठाई देते| मुनव्वर राना

  • 12th Jun 2025

    क्यूँ ये सैलाब सा!

    क्यूँ ये सैलाब सा है आँखों में,मुस्कुराए थे हम-ख़याल आया| राहत इंदौरी

  • 12th Jun 2025

    वो जो दो-गज़ ज़मीं!

    वो जो दो-गज़ ज़मीं थी मेरे नाम,आसमाँ की तरफ़ उछाल आया| राहत इंदौरी

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