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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Sep 2025

    आईनों को ले कर साथ!

    आईनों को ले कर साथ,फिरते हैं बे-चेहरे लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 12th Sep 2025

    अभिमत बदलते हैं!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि इसाक अश्क जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसाक जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है इसाक अश्क जी का यह नवगीत – रंगगिरगिट की तरहअभिमत बदलते हैं । रोज़करते हैं तरफ़दारीअंधेरों कीरोशनी कोलूटने वालेलुटेरों की इसमेंनहीं होते सफल तोहाथ मलते हैं…

  • 11th Sep 2025

    तितली के पर जैसे!

    रस्ते में मिल जाते हैं, तितली के पर जैसे लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    भाग रहे हैं दुनिया में!

    भाग रहे हैं दुनिया में,पाँव को सर पे रक्खे लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    मर जाते हैं अच्छे लोग!

    कम-उम्री में सुनते हैं,मर जाते हैं अच्छे लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    अंधे गूँगे बहरे!

    अंधे गूँगे बहरे लोग,उजले कपड़े मैले लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    सुना है कि मंज़िल!

    मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे,सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 11th Sep 2025

    अरे ओ जफ़ाओं पे!

    अरे ओ जफ़ाओं पे चुप रहने वालो,ख़मोशी जफ़ाओं की ताईद भी है| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 11th Sep 2025

    नया है ज़माना!

    चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं,नया है ज़माना नई रौशनी है| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 11th Sep 2025

    रामकली!

    आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कब उसके यौवन की धूप ढलीइतना भी नहीं जाने रामकली। सुबह सवेरे हीउठ जाती हैझाडू-पोंछा खूबलगाती है जब तब खाती डांटखूब पगली। धरम-करम कोखूब मानती हैसारे तिथि-त्योहारजानती है, जो भी करते,करते राम भली। मुद्दत से वोसेवक है घर कीसुख की दुआमांगती हैसबकी यही आस्था है…

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