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तिरी दास्ताँ कोई और थी!
तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं,तिरी दास्ताँ कोई और थी मिरा वाक़िआ कोई और है| सलीम कौसर
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वही है या कोई और है!
मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर,तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है| सलीम कौसर
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क़तरे से समंदर तक!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में श्री सोम ठाकुर जी का यह मुक्तक प्रस्तुत कर रहा हूँ-क़तरे से समंदर तक गुमनाम सिलसिला हूँ! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******
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मुझे जानता कोई और है!
अजब ए’तिबार ओ बे-ए’तिबारी के दरमियान है ज़िंदगी,मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है| सलीम कौसर
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मुझे माँगता कोई और है!
मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ,मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है| सलीम कौसर
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ओ मेरे सोना रे!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में ‘तीसरी मंज़िल’ फिल्म का गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे मोहम्मद रफी जी और आशा भोसले जी ने गाया था- ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******
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मुझे सोचता कोई और है!
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है,सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है| सलीम कौसर
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कौवे-1
आज श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री नरेश सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। नरेश जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश सक्सेना जी की यह कविता– हमारे शहर के कौवे केंचुए खाते हैंआपके शहर के क्या खाते हैं कोई थाली नहीं सजाता कौंवों के…
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दूर की सदा क्या है!
उदास रात की ख़ामोशियों में ऐ ‘क़ैसर’,क़रीब आती हुई दूर की सदा क्या है| क़ैसर शमीम