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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Apr 2025

    बीनाइयों पे रोते हैं!

    हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं,तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े| राहत इंदौरी

  • 6th Apr 2025

    लहू उछाल कि!

    सुकूत-ए-ज़ीस्त को आमादा-ए-बग़ावत कर,लहू उछाल कि कुछ ज़िंदगी में जान पड़े| राहत इंदौरी

  • 6th Apr 2025

    अनुरक्ति!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। दुष्यंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। दुष्यंत जी आपातकाल में लिखे गए ‘साये में धूप’ नामक अपने ग़ज़ल संग्रह से विशेष रूप से विख्यात हुए थे। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार…

  • 5th Apr 2025

    इशारा कर दें तो!

    ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े, इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े| राहत इंदौरी

  • 5th Apr 2025

    जाना भी तो नहीं!

    ‘वसीम’ देखना मुड़ मुड़ के वो उसी की तरफ़,किसी को छोड़ के जाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 5th Apr 2025

    आँख भीगने का सबब!

    वो पूछता था मिरी आँख भीगने का सबब,मुझे बहाना बनाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 5th Apr 2025

    नए मकान बनाए तो!

    नए मकान बनाए तो फ़ासलों की तरह,हमें ये शहर बसाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 5th Apr 2025

    जला के रख लिया!

    जला के रख लिया हाथों के साथ दामन तक,तुम्हें चराग़ बुझाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 5th Apr 2025

    हमें किसी से निभाना!

    नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया,हमें किसी से निभाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 5th Apr 2025

    वो दर्द जो चेहरों से!

    ऐ प्यार तिरे हिस्से में आया तिरी क़िस्मत,वो दर्द जो चेहरों से अदा हो नहीं सकता| वसीम बरेलवी

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