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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Sep 2025

    चलो यूँ ही सही!

    आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही,जब तलक है ख़ूबसूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    गोरे बादल, काले बादल!

    आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गोरे बादल, काले बादल आफत के परकाले बादल। कुछ तो हैं जो दिख भर जाते फिर आगे को हैं बढ जाते कुछ रूई के फाहों जैसे कुछ घनघोर गुनाहों जैसे। कब आते हैं, कब जाते हैं आवारा, मतवाले बादल। मन में लिए प्रतीक्षा…

  • 15th Sep 2025

    न मिले भीक तो!

    शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ,न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Sep 2025

    दर्द वो दे जो!

    ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझ को,दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Sep 2025

    अश्कों की लकीर!

    कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर,सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Sep 2025

    तू ने पुकारा ही न हो!

    दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी,चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Sep 2025

    क़र्ज़ उतारा ही न हो!

    ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो,कुछ न कुछ हम ने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Sep 2025

    प्यार लेकिन जो किया!

    यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत,प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Sep 2025

    इतने यक़ीं से हमने!

    कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना, कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Sep 2025

    दास्ताँ अपनी सुनाई है!

    जिस जगह पहले-पहल नाम तिरा आता है,दास्ताँ अपनी सुनाई है वहीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर

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