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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Sep 2025

    पानी पे लिखी तहरीरें!

    कौन पढ़ सकता है पानी पे लिखी तहरीरें, किस ने क्या लिक्खा है ये आब-ए-रवाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    रावण और विभीषण!

    आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कितना समझाओगे विभीषण क्या मान जाएगा दशानन। कोई लाभ नहीं है मित्र जिसके कांधों पर दस सिर हैं ऐश्वर्य, अहंकार, सामाजिक प्रतिष्ठा वह कैसे झुकेगा किसी के सामने भले ही वह ईश्वर ही क्यों न हो। खुद तुम घर के भेदी कहलाओगे, करुणा…

  • 16th Sep 2025

    सब को आता नहीं!

    सब को आता नहीं दुनिया को सजा कर जीना,ज़िंदगी क्या है मोहब्बत की ज़बाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    क्या ज़रूरी है कि!

    क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए,मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    चाँद से फूल से!

    चाँद से फूल से या मेरी ज़बाँ से सुनिए,हर जगह आप का क़िस्सा है जहाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    वैसी तो दुनिया नहीं!

    जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं,दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    आदमी में आदमिय्यत!

    भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँडना,आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    मैले हो जाते हैं रिश्ते!

    मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह,दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    वो नहीं तो कोई तो!

    वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह,जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Sep 2025

    हम कहाँ के देवता !

    हम कहाँ के देवता हैं बेवफ़ा वो हैं तो क्या,घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली

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