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पानी ने कब कहा था!
मैं ने तो तुम से की ही नहीं कोई आरज़ू,पानी ने कब कहा था कि शर्बत करो मुझे| मुनव्वर राना
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मिट्टी की सूरत करो!
फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे,इज़्ज़त के साथ दुनिया से रुख़्सत करो मुझे| मुनव्वर राना
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सुनो हवाओ अगर मैं!
बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना,सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मुझे तू ढाल दे ऐसे!
मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर मैं छू लूँ !
बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में,अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं अपने झुण्ड से!
मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा, मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं चाहता हूँ कि!
मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर वो छोड़ दे!
ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है,अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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दर-ब-दर हो जाऊँ!
मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ,मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ| मुनव्वर राना