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उन से मिल कर भी!
कुछ समझ में नहीं आता कि ये क्या है ‘हसरत’,उन से मिल कर भी न इज़हार-ए-तमन्ना करना। हसरत मोहानी
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शिकवा है गुनाह!
आशिक़ो हुस्न-ए-जफ़ाकार का शिकवा है गुनाह,तुम ख़बरदार ख़बरदार न ऐसा करना। हसरत मोहानी
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ज़िक्र उन्हीं का करना!
शाम हो या कि सहर याद उन्हीं की रखनी,दिन हो या रात हमें ज़िक्र उन्हीं का करना। हसरत मोहानी
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बाद में बरसा करना!
उन को याँ वादे पे आ लेने दे ऐ अब्र-ए-बहार,जिस क़दर चाहना फिर बाद में बरसा करना। हसरत मोहानी
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कुछ भी दुश्वार न था!
इक नज़र भी तिरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ,कुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना। हसरत मोहानी
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देखना भी तो उन्हें!
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना,शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुस्वा करना। हसरत मोहानी
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कौवे-1
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री नरेश सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नरेश जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश सक्सेना जी की यह कविता – हमारे शहर के कौवे केंचुए खाते हैंआपके शहर के क्या खाते हैं कोई थाली नहीं…
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जन्नत पुकारती है!
जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तिरे लिए, दुनिया ब-ज़िद है मुझ से कि जन्नत करो मुझे| मुनव्वर राना