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रात, नींद, सपने!
आज के लिए एक गीतआप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- रात, नींद, सपनेकब होते अपने! अंधियारी रातों के सपने भी काले, रंग भरे हों भी तो भटकाने वाले,सच से हैं दूर बहुतये सारे सपने। नींद भी कहाँ अपनी, उड़ गई कहाँ पगली, मैं इधर तलाश रहापहुंची वो और गली,नींद के विजन वन कारास्ता मधुर सपने। कैसे…
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जो गाह गाह जुनूँ!
उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है, जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हम अपने राज़ पे!
हम अपने राज़ पे नाज़ाँ थे शर्मसार न थे,हर एक से सुख़न-ए-राज़-दार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इंतिज़ार करते रहे!
वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी,हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रह-ए-ख़िज़ाँ में!
रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे,शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बहुत जानी हुई सूरत!
मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से,बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हैरानी नहीं जाती!
कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा,मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मगर दिल है कि!
कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से,मगर दिल है कि इस की ख़ाना-वीरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़