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कभी छलकी हुई!
कभी छलकी हुई शर्बत के कटोरों की तरह,और कभी ज़हर में डूबी हुई तलवार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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उड़ते हुए भौँरों की तरह!
मौसम-ए-गुल में वो उड़ते हुए भौँरों की तरह,ग़ुंचा-ए-दिल पे वो करती हुई यलग़ार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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कैफ़ियत दिल की सुनाती !
कैफ़ियत दिल की सुनाती हुई एक एक निगाह,बे-ज़बाँ हो के भी वो माइल-ए-गुफ़्तार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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तिरछी नज़रों में वो!
तिरछी नज़रों में वो उलझी हुई सूरज की किरन, अपने दुज़्दीदा इशारों में गिरफ़्तार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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वो ग़म-ख़्वार आँखें!
वो मिरी दोस्त वो हमदर्द वो ग़म-ख़्वार आँखें,एक मासूम मोहब्बत की गुनहगार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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हर दिल में है इक ज़ख़्म!
हर हँसते हुए फूल से रिश्ता है ख़िज़ाँ का,हर दिल में है इक ज़ख़्म छुपा तुम भी तो देखो| बशर नवाज़
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चुप-चाप सुलगता है!
चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो,किस दर्द को कहते हैं वफ़ा तुम भी तो देखो| बशर नवाज़
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तेज़ हवाएँ आँखों में !
तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं,जलते लम्हे रफ़्ता रफ़्ता दिल को भी झुलसाएँगे| बशर नवाज़
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सूरज किधर गया!
आज प्रस्तुत है एक और रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कई दिनों से देख रहा हूँसूरज किधर गया, कहीं राह में खेल रहा हैया अपने घर गया। बस्ता यहाँ पड़ा दिखता हैमार लगाऊंगावापस आ जाए फिर लंबी क्लास चलाऊंगा वर्षा का वह बना बहानाजाने किधर गया। अच्छा चलन नहीं दिखता हैउसका कुछ दिन सेइधर…