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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Nov 2025

    ऐ ग़म-ए-दुनिया !

    ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते,किन बहानों से तबीअ’त राह पर लाई गई| साहिर लुधियानवी

  • 4th Nov 2025

    बिक गए जब तेरे लब!

    बिक गए जब तेरे लब फिर तुझ को क्या शिकवा अगर,ज़िंदगानी बादा ओ साग़र से बहलाई गई| साहिर लुधियानवी

  • 4th Nov 2025

    कि अब तो लोग!

    तुम्हारे अहद-ए-हुकूमत का सानेहा ये है,कि अब तो लोग घरों से भी कम निकलते हैं| मुनव्वर राना

  • 4th Nov 2025

    खिलखिला के कैसे!

    तुम्ही बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ,कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम* निकलते हैं|*कष्ट मुनव्वर राना

  • 4th Nov 2025

    उसी गली से कई!

    जहाँ से हम को गुज़रने में शर्म आती है,उसी गली से कई मोहतरम निकलते हैं| मुनव्वर राना

  • 4th Nov 2025

    बहारों ने मेरा चमन लूटकर!

    आज एक बार फिर से मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मुकेश जी का बहुत प्यारा गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- बहारों ने मेरा चमन लूटकर खिज़ाओं को इल्ज़ाम क्यों दे दिया। आशा है आपको पसंद आएगा, धन्यवाद।

  • 4th Nov 2025

    मिलते हैं चाहने वाले!

    कहाँ हर एक को मिलते हैं चाहने वाले,नसीब वालों के गेसू में ख़म निकलते हैं| मुनव्वर राना

  • 4th Nov 2025

    गीत अपाहिज!

    प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गीत अपाहिजमन में भटकेकहीं नहीं पहुंचे दुनिया में! रहे छिपाए दर्द हमेशाकभी न लोगों तक पहुंचायाऔर दर्द देने वालों ने जी भरकर उत्पात मचाया, अब ये दर्द सजाएंगे हमलोगों के समक्ष बगिया में, दर्द बांटने वाले जानेंअब न ये कारोबार चलेगा, उनके कृत्य उजागर…

  • 3rd Nov 2025

    यही है ज़िद तो !

    यही है ज़िद तो हथेली पे अपनी जान लिए,अमीर-ए-शहर से कह दो कि हम निकलते हैं| मुनव्वर राना

  • 3rd Nov 2025

    हमारे जिस्म के अंदर!

    हमारे जिस्म के अंदर की झील सूख गई,इसी लिए तो अब आँसू भी कम निकलते हैं| मुनव्वर राना

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