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वैसी तो दुनिया नहीं!
जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं,दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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आदमी में आदमिय्यत!
भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँडना,आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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मैले हो जाते हैं रिश्ते!
मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह,दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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वो नहीं तो कोई तो!
वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह,जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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हम कहाँ के देवता !
हम कहाँ के देवता हैं बेवफ़ा वो हैं तो क्या,घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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चलो यूँ ही सही!
आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही,जब तलक है ख़ूबसूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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गोरे बादल, काले बादल!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गोरे बादल, काले बादल आफत के परकाले बादल। कुछ तो हैं जो दिख भर जाते फिर आगे को हैं बढ जाते कुछ रूई के फाहों जैसे कुछ घनघोर गुनाहों जैसे। कब आते हैं, कब जाते हैं आवारा, मतवाले बादल। मन में लिए प्रतीक्षा…
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न मिले भीक तो!
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ,न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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दर्द वो दे जो!
ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझ को,दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर