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चांदनी फैली गगन में, चाह मन में!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी गीत परंपरा के एक अत्यंत सम्मानित सदस्य, श्री अमिताभ बच्चन जी के पूज्य पिताश्री और हिन्दी कवि सम्मेलनों में श्रोताओं को अपने गीतों से भाव विभोर करने वाले स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत प्रस्तुत है| बाहर की दुनिया में कैसी हलचल चलती हैं ये तो सब…
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उठ मेरी बेटी सुबह हो गई!
लीजिए आज एक बार फिर से स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता प्रस्तुत है| जैसा कि मैंने पहले भी उनके बारे में लिखा है वे साप्ताहिक समाचार पत्रिका- ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में थे और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि थे| कुछ कविताओं में उनकी अभिव्यक्ति वास्तव में अद्वितीय रही है| आज की कविता…
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पहचाना सा लगे है मुझे!
मैं सोचता था कि लौटूंगा अजनबी की तरह,ये मेरा गांव तो पहचाना सा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर
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उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ!
मैं जब भी उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ,वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर