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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Feb 2022

    चांदनी फैली गगन में, चाह मन में!

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी गीत परंपरा के एक अत्यंत सम्मानित सदस्य, श्री अमिताभ बच्चन जी के पूज्य पिताश्री और हिन्दी कवि सम्मेलनों में श्रोताओं को अपने गीतों से भाव विभोर करने वाले स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत प्रस्तुत है| बाहर की दुनिया में कैसी हलचल चलती हैं ये तो सब…

  • 17th Feb 2022

    सूरज हैं सर्द मुल्कों के!

    हम तो सूरज हैं सर्द मुल्कों के,मूड आता है तब निकलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    इतने पते बदलते हैं!

    खुदरसी उम्र भर भटकती है,लोग इतने पते बदलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    काई है अब मकानों पर!

    ऐसी काई है अब मकानों पर,धूप के पाँव भी फिसलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    तब कहीं रास्ते पिघलते हैं!

    दिन पहाड़ों की तरह कटते हैं,तब कहीं रास्ते पिघलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    धूप के कारोबार चलते हैं!

    बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में,धूप के कारोबार चलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    बाहर वही निकलते हैं!

    जिनके अंदर चिराग़ जलते हैं,घर से बाहर वही निकलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    उठ मेरी बेटी सुबह हो गई!

    लीजिए आज एक बार फिर से स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता प्रस्तुत है| जैसा कि मैंने पहले भी उनके बारे में लिखा है वे साप्ताहिक समाचार पत्रिका- ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में थे और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि थे| कुछ कविताओं में उनकी अभिव्यक्ति वास्तव में अद्वितीय रही है| आज की कविता…

  • 16th Feb 2022

    पहचाना सा लगे है मुझे!

    मैं सोचता था कि लौटूंगा अजनबी की तरह,ये मेरा गांव तो पहचाना सा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर

  • 16th Feb 2022

    उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ!

    मैं जब भी उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ,वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर

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