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तिरा नाम ले के पुकार लूँ!
कई अजनबी तिरी राह में मिरे पास से यूँ गुज़र गए, जिन्हें देखकर ये तड़प हुई तिरा नाम ले के पुकार लूँ| बशीर बद्र
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मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूँ!
कहीं और बाँट दे शोहरतें कहीं और बख़्श दे इज़्ज़तें, मिरे पास है मिरा आईना मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूँ| बशीर बद्र
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तिरी बालियाँ तिरे हार लूँ!
अगर आसमाँ की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-क़याम हो, तो मैं मोतियों की दुकान से तिरी बालियाँ तिरे हार लूँ| बशीर बद्र
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तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ!
मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ, ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ| बशीर बद्र
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तुझे आइने में उतार लूँ!
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ, मिरा लफ़्ज़ लफ़्ज़ हो आईना तुझे आइने में उतार लूँ| बशीर बद्र
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तितली!
आज सोचा था कि अपने अग्रज और गुरु तुल्य स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी का एक गीत शेयर करूंगा, उनके बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं| लेकिन आज मेरी निगाह पड़ी कुंअर रवींद्र जी की एक रचना पर, सोचा आज इस रचना को ही शेयर कर…
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सहता है बग़ावत नहीं करता!
दुनिया में ‘क़तील’ उस सा मुनाफ़िक़ नहीं कोई, जो ज़ुल्म तो सहता है बग़ावत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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मज़ारों की ज़ियारत नहीं करता!
इंसान ये समझें कि यहाँ दफ़्न ख़ुदा है, मैं ऐसे मज़ारों की ज़ियारत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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औरों को नसीहत नहीं करता!
भूला नहीं मैं आज भी आदाब-ए-जवानी, मैं आज भी औरों को नसीहत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई