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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Sep 2022

    औरों को समझाएँगे!

    किन राहों से सफ़र है आसाँ कौन सा रस्ता मुश्किल है, हम भी जब थक कर बैठेंगे औरों को समझाएँगे| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Sep 2022

    जिस दिन धोका खाएँगे!

    अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हों मुमकिन है, हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोका खाएँगे| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Sep 2022

    चार किताबें पढ़ कर ये भी-

    बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Sep 2022

    वर्ना घर खो जाएँगे!

    तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं, देर न करना घर आने में वर्ना घर खो जाएँगे| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Sep 2022

    महफ़िल महफ़िल गाएँगे!

    तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे, जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Sep 2022

    उँगलियाँ थाम के खुद!

    कल मैंने अपने अग्रज और गुरु तुल्य स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी का जिक्र किया था, उनके बहुत से गीत और कविताएं मैं पहले शेयर की हैं, जब कविता नई नई रुचि पैदा हुई थी तब हम डॉक्टर कुंअर बेचैन जी को बड़े चाव से सुनते थे और अक्सर कवि गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में…

  • 2nd Sep 2022

    कोई गले लगाए मुझे!

    मैं चाहता हूँ कि तुम ही मुझे इजाज़त दो, तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे| बशीर बद्र

  • 2nd Sep 2022

    ज़रा देर को रुलाये मुझे!

    बहुत दिनों से मैं इन पत्थरों में पत्थर हूँ, कोई तो आए ज़रा देर को रुलाये मुझे| बशीर बद्र

  • 2nd Sep 2022

    अब रेत से उठाए मुझे!

    मैं जिसकी आँख का आँसू था उसने क़द्र न की, बिखर गया हूँ तो अब रेत से उठाए मुझे| बशीर बद्र

  • 2nd Sep 2022

    हवा से कहो बुझाए मुझे!

    अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ, मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे| बशीर बद्र

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