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दुश्मन ख़ानदानी चाहिए!
सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए, ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझको ख़ानदानी चाहिए| राहत इंदौरी
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ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे!
मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को, समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे!
पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज, कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे!
बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन, उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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इरादा किया था कि छोड़ दूँगा उसे!
मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उसका, इरादा मैंने किया था कि छोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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टूटा है जोड़ दूँगा उसे!
कहीं अकेले में मिलकर झिंझोड़ दूँगा उसे, जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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मकान!
आज एक बार मैं श्री रामदरश मिश्र जी की रचनाएं शेयर कर रहा हूँ| असल में यहाँ उन्होंने एक ही शीर्षक ‘मकान’ से चार कविताएं लिखी हैं|लीजिए आज प्रस्तुत हैं श्री रामदरश मिश्र जी की ये सुंदर रचनाएं – एक चिड़िया फिर टाँग गयी है तिनकेघोंसला बनाने के लिएऔर मैं फिर उजाड़ दूँगामैं कितना असहाय…
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लीजे मुलाक़ात हो गई!
वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस, उससे भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई| निदा फ़ाज़ली
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पर्दे खींच दिए रात हो गई!
सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा, खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई| निदा फ़ाज़ली