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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Sep 2022

    दुश्मन ख़ानदानी चाहिए!

    सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए, ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझको ख़ानदानी चाहिए| राहत इंदौरी

  • 4th Sep 2022

    ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे!

    मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को, समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी

  • 4th Sep 2022

    हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे!

    पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज, कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी

  • 4th Sep 2022

    मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे!

    बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन, उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी

  • 4th Sep 2022

    इरादा किया था कि छोड़ दूँगा उसे!

    मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उसका, इरादा मैंने किया था कि छोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी

  • 4th Sep 2022

    टूटा है जोड़ दूँगा उसे!

    कहीं अकेले में मिलकर झिंझोड़ दूँगा उसे, जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी

  • 4th Sep 2022

    मकान!

    आज एक बार मैं श्री रामदरश मिश्र जी की रचनाएं शेयर कर रहा हूँ| असल में यहाँ उन्होंने एक ही शीर्षक ‘मकान’ से चार कविताएं लिखी हैं|लीजिए आज प्रस्तुत हैं श्री रामदरश मिश्र जी की ये सुंदर रचनाएं – एक चिड़िया फिर टाँग गयी है तिनकेघोंसला बनाने के लिएऔर मैं फिर उजाड़ दूँगामैं कितना असहाय…

  • 3rd Sep 2022

    लीजे मुलाक़ात हो गई!

    वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस, उससे भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Sep 2022

    पर्दे खींच दिए रात हो गई!

    सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा, खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Sep 2022

    मगर मात हो गई!

    फिर यूँ हुआ कि वक़्त का पाँसा पलट गया, उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई| निदा फ़ाज़ली

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