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गुज़र जाए ख़बर लगता है!
चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है, तू जिधर हो के गुज़र जाए ख़बर लगता है| वसीम बरेलवी
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मैं तो वही खिलौना लूँगा!
आज मैं अपने जमाने में हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि रहे स्वर्गीय सियाराम शरण गुप्त जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में बाल हठ दिखाया गया है एक साधारण बालक का और एक राजकुमार का, जिनको दोनों को एक दूसरे के खिलौने पसंद आते हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सियाराम शरण…
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पार उतर जाएँ हम तो क्या!
दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र, दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी
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लौट के घर जाएँ हम तो क्या!
अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ, शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी
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जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या!
हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी