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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Sep 2022

    जिसे शाम से डर लगता है!

    तेरी क़ुर्बत के ये लम्हे उसे रास आएँ क्या, सुब्ह होने का जिसे शाम से डर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    जगह दी है तो सर लगता है!

    बे-सहारा था बहुत प्यार कोई पूछता क्या, तूने काँधे पे जगह दी है तो सर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    नहाया सा शजर लगता है!

    मैं नज़र भर के तिरे जिस्म को जब देखता हूँ, पहली बारिश में नहाया सा शजर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    क़िस्मत में सफ़र लगता है!

    एक मंज़र पे ठहरने नहीं देती फ़ितरत, उम्र भर आँख की क़िस्मत में सफ़र लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    उगा रक्खे हैं सूरज इतने!

    उसकी यादों ने उगा रक्खे हैं सूरज इतने, शाम का वक़्त भी आए तो सहर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    गुज़र जाए ख़बर लगता है!

    चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है, तू जिधर हो के गुज़र जाए ख़बर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    मैं तो वही खिलौना लूँगा!

    आज मैं अपने जमाने में हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि रहे स्वर्गीय सियाराम शरण गुप्त जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में बाल हठ दिखाया गया है एक साधारण बालक का और एक राजकुमार का, जिनको दोनों को एक दूसरे के खिलौने पसंद आते हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सियाराम शरण…

  • 5th Sep 2022

    पार उतर जाएँ हम तो क्या!

    दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र, दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी

  • 5th Sep 2022

    लौट के घर जाएँ हम तो क्या!

    अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ, शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी

  • 5th Sep 2022

    जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या!

    हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी

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