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गुज़र जाएँ हम तो क्या!
ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या, दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी
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तंगी में उसको शराब क्या देते!
शराब दिल की तलब थी शरा के पहरे में, हम इतनी तंगी में उसको शराब क्या देते| मुनीर नियाज़ी
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एक ही घर का अज़ाब क्या देते!
हवा की तरह मुसाफ़िर थे दिलबरों के दिल, उन्हें बस एक ही घर का अज़ाब क्या देते| मुनीर नियाज़ी
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बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में!
ख़राब सदियों की बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में, अब इन बे-अंत ख़लाओं में ख़्वाब क्या देते| मुनीर नियाज़ी
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अपने अमल का हिसाब क्या देते!
किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते, सवाल सारे ग़लत थे जवाब क्या देते| मुनीर नियाज़ी
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पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे!
आज मैं हिन्दी के प्रतिष्ठित नवगीतकार श्री ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे साखू की डाल पर उदासे मनउन्मन का क्या होगापात-पात पर अंकित चुम्बनचुम्बन का क्या होगामन-मन पर डाल दिए बन्धनबन्धन का…
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इक समुंदर कह रहा था-
मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया, इक समुंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए| राहत इंदौरी
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ठोकर लगानी चाहिए!
ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में, ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए| राहत इंदौरी
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तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए!
मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में, तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए| राहत इंदौरी
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थोड़ी धूप आनी चाहिए!
मैंने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है, मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए| राहत इंदौरी