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कोई मलामत नहीं करता!
घर वालों को ग़फ़लत पे सभी कोस रहे हैं, चोरों को मगर कोई मलामत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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किसी से भी रिआ’यत नहीं करता!
क्यूँ बख़्श दिया मुझसे गुनहगार को मौला, मुंसिफ़ तो किसी से भी रिआ’यत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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अपनी वकालत नहीं करता!
पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे दार पे खींचो, सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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देख के नफ़रत नहीं करता!
वो शख़्स कि मैं जिससे मोहब्बत नहीं करता, हँसता है मुझे देख के नफ़रत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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मैंने तो कुछ धूप के टुकड़े माँगे थे!
हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| आकाशवाणी, जयपुर में रहते हुए उनसे भेंट करने और गोष्ठियों में उनके साथ काव्य पाठ करने का भी अवसर मिला था| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो मैं अक्सर दोहराता हूँ, वे हैं- ‘फ्यूज बल्बों के अदभुद समारोह में,…
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हर हाथ मिलाने वाला!
तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’, दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला| अहमद फ़राज़
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ख़्वाब की ताबीर बताने वाला!
मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते, है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला| अहमद फ़राज़
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सर-ए-दार भी लाने वाला!
क्या ख़बर थी जो मिरी जाँ में घुला है इतना, है वही मुझको सर-ए-दार भी लाने वाला| अहमद फ़राज़
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यहाँ कौन है आने वाला!
मुंतज़िर किसका हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं, कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला| अहमद फ़राज़