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दिल को धड़कना देखूँ!
तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात, जाने क्यूँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ| परवीन शाकिर
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तिरी याद में तन्हा देखूँ!
एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ, आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ| परवीन शाकिर
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भूलने वाले मैं कब तक
शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी, भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ| परवीन शाकिर
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तन्हाई का सहरा देखूँ!
नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ, आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ| परवीन शाकिर
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इंद्रधनुष!
आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी कवि और संपादक स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नंदन जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की यह कविता – एक सलोना झोंकाभीनी-सी खुशबू का,रोज़ मेरी नींदों को…
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और मैं क्या क्या देखूँ!
अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ, इक ज़रा शेर कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ| परवीन शाकिर