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ख़ुद से मुलाक़ात हुई!
कोई हसरत कोई अरमाँ कोई ख़्वाहिश ही न थी, ऐसे आलम में मिरी ख़ुद से मुलाक़ात हुई| मंज़र भोपाली
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दिन भी डूबा कि नहीं!
दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं, जिस जगह बुझ गए आँखों के दिए रात हुई| मंज़र भोपाली
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टूट के बरसात हुई!
आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई, ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई| मंज़र भोपाली
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संक्रांति!
आज एक बार मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – ढाल रही ख़ुद कोबल्लू की भाषा में दादी । खल में कूट-कूट शब्दों…