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लोग तेरी सादगी को!
न शोख़ी शोख़ है इतनी न पुरकार इतनी पुरकारी, न जाने लोग तेरी सादगी को क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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होश आया मोहब्बत में!
हमारा ज़िक्र क्या हमको तो होश आया मोहब्बत में, मगर हम क़ैस का दीवाना हो जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तेरी आवाज़!
आज मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की यह रचना – कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़अब सुनाए कोई वही आवाज़। ढूँढ़ता हूँ मैं आज भी…
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सहरा समझते हैं!
कहीं हों तेरे दीवाने ठहर जाएँ तो ज़िंदाँ है, जिधर को मुँह उठा कर चल पड़े सहरा समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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खटका समझते हैं!
यही ज़िद है तो ख़ैर आँखें उठाते हैं हम उस जानिब, मगर ऐ दिल हम इसमें जान का खटका समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उमीदों में भी उनकी!
उमीदों में भी उनकी एक शान-ए-बे-नियाज़ी है, हर आसानी को जो दुश्वार हो जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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शायद भेस बदला है!
कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेस बदला है, तिरे दम भर के मिल जाने को हम भी क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दीवाना समझते हैं!
बस इतने पर हमें सब लोग दीवाना समझते हैं, कि इस दुनिया को हम इक दूसरी दुनिया समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बताएँ क्या समझते हैं!
किसी बदमस्त को राज़-आश्ना सब का समझते हैं| निगाह-ए-यार तुझ को क्या बताएँ क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी