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ज़माने के डर से हम!
भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हम, ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम| साहिर लुधियानवी
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फिर मुझको रसखान बना दे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी कवि सम्मेलनों और उर्दू मुशायरों में जिनको समान रुचि के साथ श्रोताओं द्वारा सुना जाता था, ऐसे स्वर्गीय बेकल उत्साही जी का गीत शेयर कर रहा हूँ| बेकल जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय बेकल उत्साही जी…
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आग का दरिया देखूँ!
टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े, तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ| परवीन शाकिर
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और भी तुझ सा देखूँ!
तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब, जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ| परवीन शाकिर
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आँखों में उतरता देखूँ!
मैंने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार, ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ| परवीन शाकिर
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उन होंटों का साया देखूँ
फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए, पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ| परवीन शाकिर
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रुत में महकता देखूँ!
मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह, अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ| परवीन शाकिर
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यात्रा!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी वरिष्ठ गीतकार और संपादक श्री बालस्वरूप राही जी का गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – इन पथरीले वीरान पहाडों परज़िन्दगी थक गई है चढ़ते-चढ़ते…
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एक बच्चे की तरह से!
सब ज़िदें उसकी मैं पूरी करूँ हर बात सुनूँ, एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ| परवीन शाकिर
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हर रोज़ तमाशा देखूँ!
बंद करके मिरी आँखें वो शरारत से हँसे, बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ| परवीन शाकिर