Category: Uncategorized
-
जब भी आबशार दिखे!
रवाँ हैं फिर भी रुके हैं वहीं पे सदियों से, बड़े उदास लगे जब भी आबशार* दिखे| *झरना गुलज़ार
-
जो न बन पाई तुम्हारे!
आज मैं हिन्दी काव्य परंपरा के एक अत्यंत श्रेष्ठ कवि, जिन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे, ऐसे प्रखर राष्ट्रवादी कवि स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की यह रचना –…
-
फूल बे-शुमार दिखे!
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री, ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे| गुलज़ार
-
सहर होने को भी हम!
‘फ़िराक़’ इस गर्दिश-ए-अय्याम से कब काम निकला है, सहर होने को भी हम रात कट जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
न हम दरिया समझते हैं
ये हस्ती नीस्ती सब मौज-ख़ेज़ी है मोहब्बत की, न हम क़तरा समझते हैं न हम दरिया समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
रौंदते जाते हैं काँटों को
ये कह कर आबला-पा रौंदते जाते हैं काँटों को, जिसे तलवों में कर लें जज़्ब उसे सहरा समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
तुझे अपना समझते हैं!
भुला दीं एक मुद्दत की जफ़ाएँ उसने ये कह कर, तुझे अपना समझते थे तुझे अपना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
लोग तेरी सादगी को!
न शोख़ी शोख़ है इतनी न पुरकार इतनी पुरकारी, न जाने लोग तेरी सादगी को क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
होश आया मोहब्बत में!
हमारा ज़िक्र क्या हमको तो होश आया मोहब्बत में, मगर हम क़ैस का दीवाना हो जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी