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ख़्वाहिश पे दम निकले!
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब
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जीवन के पतझड़ में!
किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और अनूठी प्रस्तुति शैली से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का एक सुंदर गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंग जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का यह गीत –…
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तो बार बार दिखे!
कोई तिलिस्मी सिफ़त थी जो इस हुजूम में वो, हुए जो आँख से ओझल तो बार बार दिखे| गुलज़ार
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हमको इंतिज़ार दिखे!
कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़, किसी की आँख में हमको भी इंतिज़ार दिखे| गुलज़ार