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दिल की रगों का टूटना
ये सुकूत-ए-नाज़ ये दिल की रगों का टूटना, ख़ामुशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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राज़ की बातें करो!
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो, बे-ख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मैं इक दिन ख़ुद ही!
मुझ को समझाओ न ‘साहिर’ मैं इक दिन ख़ुद ही, ठोकरें खा के मोहब्बत में सँभल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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मैं कोई मोम नहीं हूँ!
सोज़ भर दो मिरे सपने में ग़म-ए-उल्फ़त का, मैं कोई मोम नहीं हूँ जो पिघल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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हम सब काशी के पंडे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर और मेरे लिए गुरुतुल्य रहे, अत्यंत सरल स्वभाव के धनी स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का…
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तेरा वा’दा तो नहीं हूँ!
मेरी तक़दीर में जलना है तो जल जाऊँगा, तेरा वा‘दा तो नहीं हूँ जो बदल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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गुज़रे जिधर से हम!
माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके, कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम| साहिर लुधियानवी
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किसी की नज़र से हम!
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है, क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम| साहिर लुधियानवी
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कुछ और बढ़ गए जो!
कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआ, मायूस तो नहीं हैं तुलू-ए-सहर* से हम| *Sunrise साहिर लुधियानवी