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इख़्तियार चले गए!
न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तिरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़म-गुसार चले गए!
तिरी कज-अदाई से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जाँ-निसार चले गए!
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मेरे देश के लाल!
लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है प्रसिद्ध कवि और राजनेता रहे स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता| बैरागी जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह कविता – पराधीनता को जहाँ समझा श्राप महानकण-कण के खातिर जहाँ हुए कोटि…