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ए’तिबार कोई तो हो!
किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब, मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए’तिबार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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बे-क़रार कोई तो हो!
न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो, किसे बज़्म-ए-शौक़ में लाएँ हम दिल-ए-बे-क़रार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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तुझे यादगार बना दिया!
जो रुके तो कोह-ए-गिराँ* थे हम, जो चले तो जाँ से गुज़र गए, रह-ए-यार हमने क़दम क़दम, तुझे यादगार बना दिया| *Big Mountain फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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पढ़ के मिटा दिया!
उधर एक हर्फ़ कि कुश्तनी, यहाँ लाख उज़्र था गुफ़्तनी, जो कहा तो सुन के उड़ा दिया, जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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क़ातिलों को गुमाँ न हो!
करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न, मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो, कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन पस-ए-मर्ग हम ने भुला दिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जो वो क़र्ज़ रखते थे!
मिरे चारा-गर को नवेद हो सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो, जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चुका दिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दाग़-दाग़ लुटा दिया!
न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया, जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आग का अपना-पराया क्या!
आज एक बार फिर से मैं, किसी समय अपनी कविताओं और गीतों से काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले प्रसिद्ध कवि और स्वर्गीय शिशुपालसिंह निर्धन जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| निर्धन जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपालसिंह निर्धन जी का यह गीत…
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वो गुनाहगार चले गए!
न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफ़ा ये रसन ये दार करोगे क्या, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दाग़ थे जो सजा के हम
ये हमीं थे जिनके लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गई, यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़