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चुभता हो तो ऐसा हो!
इस दर्द में क्या क्या है रुस्वाई भी लज़्ज़त भी, काँटा हो तो ऐसा हो चुभता हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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अपना हो तो ऐसा हो!
वो भी रहा बेगाना हमने भी न पहचाना, हाँ ऐ दिल-ए-दीवाना अपना हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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वो बैठा भी धोका हो तो ऐसा हो!
हमसे नहीं रिश्ता भी हमसे नहीं मिलता भी, है पास वो बैठा भी धोका हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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होना हो तो ऐसा हो!
दरिया ब-हुबाब-अंदर तूफ़ाँ ब-सहाब-अंदर, महशर ब-हिजाब-अंदर होना हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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रुस्वा हो तो ऐसा हो!
ऐ क़ैस-ए-जुनूँ-पेशा ‘इंशा’ को कभी देखा, वहशी हो तो ऐसा हो रुस्वा हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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सिमटा हो तो ऐसा हो!
इक ख़ाल-ए-सुवैदा में पहनाई-ए-दो-आलम, फैला हो तो ऐसा हो सिमटा हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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सहरा हो तो ऐसा हो!
दिल इश्क़ में बे-पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो, दरिया हो तो ऐसा हो सहरा हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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ठहराव!
आज मैं अपने समय के प्रसिद्ध हिन्दी कवि रहे स्वर्गीय शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अनेक पुरस्कारों से अलंकृत सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की यह कविता – तुम तो यहीं ठहर गयेठहरे तो…
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याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा!
हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे, तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा| इब्न-ए-इंशा
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हसरत का जहाँ याद रहेगा!
आँखों में सुलगती हुई वहशत के जिलौ में, वो हैरत ओ हसरत का जहाँ याद रहेगा| इब्न-ए-इंशा