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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Mar 2023

    हमसे क्या मनवाओगे!

    अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो, अपने बस की बात ही क्या है हमसे क्या मनवाओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    कब बरखा बरसाओगे!

    बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में, कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    कब तक याद न आओगे!

    कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे, कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    दिल में सितारे उतरने लगते हैं!

    दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है, तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं!

    वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी*, फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं|Speaking in style फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    आँसू उभरने लगते हैं!

    सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन, तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    तेरी गली से गुज़रने लगते हैं!

    हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    तुम्हें याद करने लगते हैं!

    तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Mar 2023

    कटती फसलों के साथ!

    अपने समय में हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का एक नवगीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ| ठाकुरप्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – कटती फसलों के साथ कट गया सन्नाटाबजती फसलों…

  • 20th Mar 2023

    दाता हो तो ऐसा हो!

    हमने यही माँगा था उसने यही बख़्शा है, बंदा हो तो ऐसा हो दाता हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा

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